ईटों का मकान नहीं , न है सीमेंट की दीवार
घर तो है वो मंदिर , जिसमे रहता है परिवार
जहां एक पिता रात को , आता काम से थक हार
माँ बच्चे को गले लगाकर , करती ममता का इज़हार
ऐसे में इक बड़ा बेटा , जिसपे ज़िम्मेदारियों का भार
चाहे मेहनत जितनी भी हो , जाएगा कर हर दरिया पार
माता-पिता होंगे गर्वीले , फक्र करेगा ये संसार
बेटी भी है कुछ कम नहीं , करना चाहे सपना साकार
अपने पैरों पर हो खड़ी , देगी जीवन को नया आकार
किस घर में न होते झगड़े , कहाँ न होता मन मुटाव
एक जुट होकर जो रहे , वही कहलाता है परिवार

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