ज़िंदगी की गाड़ी चलते कदमों से रूठ गयी

ज़िंदगी की गाड़ी , चलते कदमों से रूठ गयी
जो पकड़ रखा था हाथों से ,ममता की डोर वो छूट गयी
वक्त विदा लेने का आया जब , आँखों से यादों की बौछारें फूट गईं
ज़िंदगी की गाड़ी ,चलते कदमों से रूठ गयी

माँ की वो सीख , उनका प्यार , वो घर का आंगन ॥
सब खो गए कहीं , खाली हो गया मन का प्रांगण॥
मुझे एक सैनिक बनाते बनाते , उनके हाथों की चूड़ियाँ टूट गईं
ज़िंदगी की गाड़ी ,चलते कदमों से रूठ गयी

पिता ने सिखाया था , हार न मानने का नुस्खा ॥
मुश्किलें तो होंगी , पर अड़े रहना तुम हमेशा ॥
मौत आई मुझे ले जाने और, पिता के साइकल की सवारी लूट गयी
ज़िंदगी की गाड़ी ,चलते कदमों से रूठ गयी

भारत माँ की सेवा में तैनात था !!, बहन को हर बार यही बताया
हर राखी के त्योहार में , उसने गुबारे की तरह मुह फुलाया
इस बार मिलना था मुझे उससे , पर रक्षा बंधन के धागे की वो कड़ियाँ टूट गईं
ज़िंदगी की गाड़ी ,चलते कदमों से रूठ गयी

ग़म नहीं मुझे ,मेरे मौत के आने का ,
आखिर कितनों को मौका मिलता है , लहू देकर देश बचाने का?
अंतिम साँसों में भी , ज़ुबान से वंदे मातरम की गूंज गयी
ज़िंदगी की गाड़ी , चलते कदमों से रूठ गयी ॥॥

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