रचना

अंधियारे से निकलो

आओ, चिराग के मज़े लेते हैं

विविक्ता छोड़ फलक से कुछ कहे लेते हैं

डूबे- डूबे से रहते हैं आज कल हम

चलो ज़रा तटिनी के संग बहे लेते हैं।

ख्वाबों में खुद को कहाँ कहाँ ले जाएँ

कभी तो हकीकत में भी चले लेते हैं

जग बदलने की चाह ने इतना झिंझोड़ दिया हमको

के हार कर जग से जग में ढले लेते हैं।

फिर सोचा कि क्यों न हम हम ही रह जाएँ

कुछ दिन और ये सब सहे लेते हैं

संसार में परिवर्तन का निर्णय रद्द न कर के

इक और नव्य रचना किये लेते हैं।

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