बेटे ही कुल का मान बढ़ाते हैं?

आने से पहले ही अंकुश लगाया गया

मुझे किसी और से ज़रा कम बताया गया

जन्म के बाद से सब एक ही राग गाते हैं

बेटे तो कुल का मान बढ़ाते हैं।

खिलौने , कपड़े अब तो रंग में भी भेद है

बेटी होने पर मुझे तनिक न खेद है

लिंग के नाम पर बेसुरा तान सुनाते हैं

बेटे तो कुल का मान बढ़ाते हैं।

पढ़ना चाहा तो रोक- टोक की गई

आगे बढ़ना चाहा तो खोट दिख गयी

बेटे को हाथ बटाना नहीं सिखाते हैं

क्योंकि , बेटे तो कुल का मान बढ़ाते हैं।

जैसे तैसे ज़िन्दगी जीती गयी

कहना बहुत कुछ था पर होंठ सीती चली गयी

न जाने किस बात का इतना रौब दिखाते हैं

क्या केवल बेटे ही कुल का मान बढ़ाते हैं?

निखत ज़रीन —भारतीय बॉक्सर।

https://poemsnwriteups.poetry.blog/

Copyright © 2023 poemsnwriteups.poetry.blog web hosting

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें