पैसा

इसके दम पे दुनिया चलाते हैं
झूठ को सच , सच को झूठ बनाते हैं
ज़रूरत है इसकी माना , मगर
यही ज़रूरतें हमे इसका गुलाम बनाते हैं

कहते हैं ये है तो कोई ग़म नहीं
मैं कहती हूँ ज़्यादा हो तो हम हम नहीं
और इसकी लत लगते ही इंसान में रही शर्म नहीं
कम मे भी बहुत हो सकता है
पर क्या हो अगर
इस्तेमाल करने का हो ढंग नहीं

खरीद लोगे मकान उसे घर बना पाओगे?
सीटें खरीदने से क्या अपना ज्ञान बढ़ा पाओगे?
डिग्रियाँ खरीद भी लो तो काबीलियत ला पाओगे?
और तब कहाँ जाता है ये पैसा जब किसी की जान पर बल आए?
तोहफे तो ठीक है मगर कोई खूबसूरत पल लौटा पाओगे? अमीर तो बन जाओगे क्या अच्छा इंसान बन पाओगे?

इसका राग अलापने वाले तो बहुत मिलेंगे
कब आएगा वो वक्त जब हम इसका सही उपयोग करेंगे?
और जिनके पास हो थोड़ी सी संतुष्टि
उनको इसकी कमी कभी खलती नहीं
वो रास्ते खुद निकलते हैं ज़रूरतें पूरी करने की
इसे कमाते हैं , बचाते हैं , यूं ही उड़ाते नहीं।

नया सफर!!!!

Copyright © 2023 poemsnwriteups.poetry.blog web hosting

टिप्पणी करे

Design a site like this with WordPress.com
प्रारंभ करें