कलयुग

क्या ज़हर अमृत लगा है कभी?

या सुधा ने विष का रूप लिया?

क्या नीर कभी है अनल बना?

या रम्य बेडौल प्रतीत हुआ?

क्या ओज ने तमस किया खुद को?

या असित का श्वेत पे विजय हुआ?

क्या त्रिदिव भी आज पाताल बना?

या मनुज- दनुज का भेद ग़ुमा?

जो दिशा दिखाने आये थे

वे खुद विच्युत हैं भटक रहे।

ये कैसी दशा है आज हुई

जीते -जी इंसां तड़प रहे।

खुद से ही जो हैं अचेत हुए

वे ईश की खोज में हैं निकले।

ये कौन जहाँ? पूछूँ का से?

सारे मूरख अब इस जग में।

उत्साह से हैं जो नाच रहे।

इनको न ज्ञान हुआ अब तक

आरंभ अंत का निकट बड़ा

ये अंत की पोथी बाँच रहे।

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2 responses to “कलयुग”

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