पुरुष

खेल मत उसके हृदय से यूँ खिलौना जान कर
ना समझ तू वस्तु उसको उसका तू सम्मान कर

खामियों के सबब तू उसकी तो यूँ निंदा न कर
हो यदि संभव बजा ताली तु उसकी उड़ान पर

शक नहीं करना कभी-भी उसके तू सामर्थ पर
है तू उसके पास हर दम आनुदान को अग्रसर

जिस धरा पर हो रही है दुख की वर्षा सेर भर
प्रेम की तू उस धरा पर वृष्टि मुसलाधार कर

वो न छीने आबरू उसकी किसी मझधार पर
वो न आने दे तनिक भी आंच उसके मान पर

वो नहीं जो समझे कायर उसको उसके मौन पर
वो जो उसके द्वंद्व में जाए न उसको छोड़कर

वो… पुरुष है , उस…. स्त्री के सम्मान में ….

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