भारत अंबा के लाल को माँ की , वर्णहरित आँचल ने संभाला
आँचल की ममता में पला-बढ़ा और स्मृतिभूमि को ही माँ कह डाला ।
शस्त्र-शास्त्र का ज्ञान हुआ जब , देख तिरंगा हुआ मतवाला
मैं तो करूंगा इस देश की रक्षा , वीरता का था प्रमाण निराला।
केसरिया एक साँझ को उसने त्याग दिया मोह-माया का माला
साथ छूटा उस दामन का जिसने बाल्यावस्था से उसको था पाला
धूसर थे वो अश्रु जो नैनन से बहते गए ना ही गया संभाला
निर्माता से उस व्यथित हृदय पे मार दिया उसने चुप्पी का ताला।
जीवन उसका हुआ कुछ ऐसा नींद गई और न भूख ही आली
पीली सी तपती सरहद थी कहीं पे , काले-नीले कहीं कीचड़ और नाली
रात का सन्नाटा था कहीं पे और कहीं पे धमाके की राली
करता रहा इस उद्यान की रक्षा निश्चल, समर्पित, उद्यमित माली
बैठा जो एक दिन था नभ की शीतलता में होने लगी थी वहाँ गोली बारी
साहस का शस्त्र उठा उस योद्धा ने जोश से की थी रण की सवारी
गोली लगी जब उसके सीने पर , गिरा धरती पर ना हिम्मत हारी
रक्त के रंग से धरती सजी थी पलड़ा था देशप्रेम का भारी
युद्ध का जब परिणाम आया तो विश्व में हर ओर शांति छाई
धरती माँ के उस लाल का क्या जिसने देशप्रेम में थी जान गंवाई
ढांक दिया सबने उसके शव को , पारद की थी परत चढ़ाई
लिपटा तिरंगे में मुस्का रहा था मानो जैसे सारी खुशियां थी पाई ।

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