श्रेणी: poems
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वर्णाख्यान
भारत अंबा के लाल को माँ की , वर्णहरित आँचल ने संभाला आँचल की ममता में पला-बढ़ा और स्मृतिभूमि को ही माँ कह डाला । शस्त्र-शास्त्र का ज्ञान हुआ जब , देख तिरंगा हुआ मतवाला मैं तो करूंगा इस देश की रक्षा , वीरता का था प्रमाण निराला। केसरिया एक साँझ को उसने त्याग दिया…
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पुरुष
खेल मत उसके हृदय से यूँ खिलौना जान करना समझ तू वस्तु उसको उसका तू सम्मान कर खामियों के सबब तू उसकी तो यूँ निंदा न करहो यदि संभव बजा ताली तु उसकी उड़ान पर शक नहीं करना कभी-भी उसके तू सामर्थ परहै तू उसके पास हर दम आनुदान को अग्रसर जिस धरा पर हो…
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कलयुग
क्या ज़हर अमृत लगा है कभी? या सुधा ने विष का रूप लिया? क्या नीर कभी है अनल बना? या रम्य बेडौल प्रतीत हुआ? क्या ओज ने तमस किया खुद को? या असित का श्वेत पे विजय हुआ? क्या त्रिदिव भी आज पाताल बना? या मनुज- दनुज का भेद ग़ुमा? जो दिशा दिखाने आये थे…
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आवतार
याद तू करेगा जब वो आवतार आएगा1 ढूंढता रहेगा तू वो लौट के जो जाएगा ज्ञान न तुझे है उसके जादुई प्रकाश का5 क्रोध में है जो करे वो तीव्र से विनाश का भोला है वो आशुतोष उदारता का पात्र है2 भूलना न वो गुरु है और तू उसका छात्र है ध्यान जो करे वो…
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पैसा
इसके दम पे दुनिया चलाते हैंझूठ को सच , सच को झूठ बनाते हैंज़रूरत है इसकी माना , मगरयही ज़रूरतें हमे इसका गुलाम बनाते हैं कहते हैं ये है तो कोई ग़म नहींमैं कहती हूँ ज़्यादा हो तो हम हम नहींऔर इसकी लत लगते ही इंसान में रही शर्म नहींकम मे भी बहुत हो सकता…
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शाम
शाम हो गयी है एक और दिन गुज़र गया जिस वक्त का इंतज़ार था वो जाने किधर गया आसमान आसमानी छोड़ सब रंग बिखेरे हुए है ये दृश्य देखते ही मेरा दिन संवर गया। मौसम का हाल क्या खूब हुआ रक्खा है अद्भुत वातावरण देखने में कितना अच्छा है ये देख मेरा मन न जाने…
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बेटे ही कुल का मान बढ़ाते हैं?
आने से पहले ही अंकुश लगाया गया मुझे किसी और से ज़रा कम बताया गया जन्म के बाद से सब एक ही राग गाते हैं बेटे तो कुल का मान बढ़ाते हैं। खिलौने , कपड़े अब तो रंग में भी भेद है बेटी होने पर मुझे तनिक न खेद है लिंग के नाम पर बेसुरा…
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रचना
अंधियारे से निकलो आओ, चिराग के मज़े लेते हैं विविक्ता छोड़ फलक से कुछ कहे लेते हैं डूबे- डूबे से रहते हैं आज कल हम चलो ज़रा तटिनी के संग बहे लेते हैं। ख्वाबों में खुद को कहाँ कहाँ ले जाएँ कभी तो हकीकत में भी चले लेते हैं जग बदलने की चाह ने इतना…
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बेटियाँ
झाँसी की रानी सी वीर बेटियाँ ज़ोया अग्गरवाल सी बुनती तकदीर बेटियाँ ऐसा कौन सा कार्य है जो एक बेटी नहीं कर सकती ? अफसर बन के नाम करे है, घर का ध्यान भी रखती । दया कि देवी , लष्मीरूपिणी , अन्नपूर्णा कहलाती समय आने पर शस्त्र उठा माँ दुर्गा भी बन जाती रचनाओं…
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बचपन
टॉफी के लिए ज़िदियाना था रोते-रोते शोर मचाना था नभ में उड़ने का सपना जाना-पहचाना था चंदा मामा को अपने पास बुलाना था यादों का वो पिटारा सुहाना था बचपन का अंदाज़ बड़ा शायराना था। डोरेमोन का चित्र बनाना था झूले को ज़ोरों से झुलाना था कितना मज़ेदार बारिश का आना था स्कूल न जाने…
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एक फूल अभी बस खिला ही था
एक फूल अभी बस खिला ही था नयी दुनिया से वो बस मिला ही था महकाना था उसे आँगन का हर एक कोना पर पड़ गया उसे अपना असतित्व खोना चाहता था वो डालियों को सजाना , मगर उसकी इच्छा को आखिर किसने जाना ? सब सोचते रहे कि कमजोर ही रहा होगा!!! किसे पता…
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मौसम
एक ही देश कई दिशाएँ कहीं पे धूप कहीं हवाएँ मौसम की आज़ाद फिज़ाएँ सब के मन में घर कर जाएँ।। मन के मारे , हम बंजारे आखिर कैसे मन बहलाएँ चिंता-विंता कर लें तब भी समझ न आये ,किधर को जाएँ।। https://poemsnwriteups.poetry.blog/ Copyright © 2023 poemsnwriteups.poetry.blog web hosting
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ज़िंदगी की गाड़ी चलते कदमों से रूठ गयी
ज़िंदगी की गाड़ी , चलते कदमों से रूठ गयीजो पकड़ रखा था हाथों से ,ममता की डोर वो छूट गयीवक्त विदा लेने का आया जब , आँखों से यादों की बौछारें फूट गईंज़िंदगी की गाड़ी ,चलते कदमों से रूठ गयी माँ की वो सीख , उनका प्यार , वो घर का आंगन ॥सब खो गए…
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बटोही
पुरानी यादें तो साथ हैं , बस एहसास नया है ज़िन्दगी के बीते पन्नों में ये इतिहास नया है सुर और ताल वही हैं , गाने का अंदाज़ नया है सफलता की चाह वही है पर आग़ाज़ नया है शरीर के कण वही हैं ,उनमे स्वास नया है ख्वाब चाहे पुराने हों पूरे होने का…
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नया साल
दिन बीत गए पुराने सारे , अब आया नया सवेरा है । सुख-दुख में यूं हँसकर गाकर , करना पार ये डेरा है । नयी उमंग खुशहली है आई , प्रगति का संदेश है लायी । खेलें खाएं खुशियाँ मनाएँ , कहती है मन की परछाई । गिरते-पड़ते सीखते चलते , बिता दिया इक पूरा…
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अंजाने वीर
आज़ादी की कीमत को तो सबने है पहचाना फिर भी वीरों की गाथा में रेह गया कोई अंजाना जान गयी तो थी सब वीरों की , पर आज तक जग ने कितनों को है जाना? बलिदान को उनके सबने गौरव से सम्माना है सलाम उनके बलिदान को जिन्होंने देश को अपने परिवार से भी बढ़कर…
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आएगा कभी मौसम सुहाना
आग सी तप्ति धूप में , खुद को संभालना हमने जाना । न रुके इस इंतज़ार मे , के आयेगा कभी मौसम सुहाना ! तेज़ बारिश मे अड़े रहे , न हिलेंगे था ये ठाना । आखिर कब तक इंतज़ार करेंगे ? के आएगा कभी मौसम सुहाना ! तय किया फिर आगे बढने का ,…
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उड़ान
अंजाने थे , या जाने , इसकी मुझको खबर नहीं । बस इतना पता है कि , बुझी आस को अग्नि दी । ख्वाबों को दिये नए पंख और , मन का फिर उत्साह बढ़ा । अब लगता है ऐसा मुझको , रच दूँ इक इतिहास नया । इक पंछी सी हूँ मैं उड़ रही…
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परिवार
ईटों का मकान नहीं , न है सीमेंट की दीवार घर तो है वो मंदिर , जिसमे रहता है परिवार जहां एक पिता रात को , आता काम से थक हार माँ बच्चे को गले लगाकर , करती ममता का इज़हार ऐसे में इक बड़ा बेटा , जिसपे ज़िम्मेदारियों का भार चाहे मेहनत जितनी भी…